रायपुर/ छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत एक बड़ा फैसला सुनाते हुए निजी स्कूलों और शिक्षा विभाग की लापरवाही पर कड़ा प्रहार किया है। आयोग की सख्ती के कारण न केवल बंद हो चुका RTE पोर्टल दोबारा खुला, बल्कि एक गरीब पालक को 10 माह बाद उसके बच्चे की पूरी फीस भी वापस मिली।
क्या था पूरा मामला?
एक जरूरतमंद पालक ने अपने बच्चे के भविष्य के लिए शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत आवेदन किया था। अप्रैल में हुई प्रथम चरण की लॉटरी में बच्चे का चयन भी हो गया, लेकिन स्कूल प्रबंधन और नोडल अधिकारी की उदासीनता के कारण उसे प्रवेश नहीं मिल सका।
- स्कूल का तर्क: पालक ने संपर्क नहीं किया।
- नोडल अधिकारी का तर्क: पालक ने फोन नहीं उठाया।
- परिणाम: विवश होकर पालक ने 16,000 रुपये फीस भरकर उसी स्कूल में सशुल्क प्रवेश लिया।
आयोग की कार्यवाही और बड़ा फैसला
लगभग 10 माह बाद जब यह मामला बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पास पहुँचा, तो अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने इस पर त्वरित संज्ञान लिया। आयोग ने सुनवाई के दौरान पाया कि प्रक्रियागत खामियों की सजा बच्चे को नहीं दी जा सकती।
आयोग के प्रमुख निर्देश:
- फीस वापसी: स्कूल को तत्काल प्रभाव से पालक की जमा की गई पूरी राशि (16,000 रुपये) लौटाने का आदेश दिया गया।
- पोर्टल दोबारा खुला: शिक्षा विभाग को विशेष रूप से पोर्टल खोलकर बच्चे का नाम निःशुल्क सीटों में दर्ज करने के निर्देश दिए गए, ताकि भविष्य में उसकी पढ़ाई पूरी तरह निःशुल्क रहे।