मुख्य अतिथि की आसंदी से संबोधित करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख किया। उन्होंने कहा:
“जैसे प्राचीन समय में छत्तीसगढ़ के ‘छत्तीस किले’ शासन और सुरक्षा के केंद्र थे, वैसे ही आज हमारे संवैधानिक न्यायालय लोकतंत्र के आधुनिक किले हैं। ये किले सीमाओं की नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों और संवैधानिक मर्यादाओं की रक्षा करते हैं।”
उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि न्यायपालिका को समाज से अलग नहीं होना चाहिए। उन्होंने आह्वान किया कि उच्च न्यायालय की दृष्टि और संवेदनशीलता का विस्तार दंतेवाड़ा, बस्तर और सरगुजा जैसे दूरस्थ क्षेत्रों तक होना चाहिए, ताकि अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को भी न्याय मिल सके।
समारोह के विशिष्ट अतिथि छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि यह ई-स्मारिका केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि 2003 से अब तक की अकादमी की विकास यात्रा का सजीव प्रमाण है। उन्होंने सीजेआई की उपस्थिति को राज्य की न्यायपालिका के लिए प्रेरणा का स्रोत बताया
इस अवसर पर उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति श्री पमिदिघनतम श्री नरसिम्हा और श्री प्रशांत कुमार मिश्रा भी उपस्थित थे। न्यायमूर्ति मिश्रा के छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय से पुराने जुड़ाव को याद करते हुए उनके योगदान की सराहना की गई।
कार्यक्रम का समापन छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति श्री संजय के. अग्रवाल के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
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