16-17 अप्रैल के विशेष सत्र में पेश होगा बिल | नया परिसीमन आयोग बनेगा | महिला आरक्षण लागू करने का रास्ता होगा साफ
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक बड़े संरचनात्मक बदलाव की तैयारी कर ली है। सरकार ‘131वां संविधान संशोधन विधेयक, 2026’ (The Constitution 131st Amendment Bill, 2026) के जरिए लोकसभा की कुल सदस्य संख्या को मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव ला रही है। यह ऐतिहासिक विधेयक 16 और 17 अप्रैल को बुलाए गए संसद के विशेष सत्र में पेश किया जाएगा। इस कदम से न केवल लोकसभा का स्वरूप बदलेगा, बल्कि लंबे समय से प्रतीक्षित महिला आरक्षण लागू करने का रास्ता भी साफ हो जाएगा।
प्रस्तावित विधेयक में संविधान के अनुच्छेद 81 (Article 81) में संशोधन कर नई व्यवस्था दी गई है। इसके अनुसार, 850 सीटों का बंटवारा इस प्रकार होगा:
वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर ही निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन (Delimitation) अनिवार्य था। लेकिन, सरकार संविधान के अनुच्छेद 82 में संशोधन कर इस अनिवार्यता को हटा रही है। इस बदलाव से 2026-27 की जनगणना से पहले भी परिसीमन प्रक्रिया शुरू की जा सकेगी। गौरतलब है कि वर्तमान में सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना और निर्वाचन क्षेत्रों का सीमांकन 2001 की जनगणना पर आधारित है, जबकि इस बीच देश की जनसंख्या में भारी बदलाव आ चुका है।
यह विधेयक महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को जल्द से जल्द लागू करने का मार्ग प्रशस्त करेगा। वर्ष 2023 में पारित ‘106वें संविधान संशोधन अधिनियम’ के तहत महिला आरक्षण को परिसीमन के बाद लागू होना था, जो जनगणना से अटका हुआ था। अब, अनुच्छेद 334A में संशोधन कर परिसीमन के तुरंत बाद आरक्षण लागू करने की राह आसान हो जाएगी। इसमें SC/ST वर्ग की महिलाओं के लिए भी आरक्षण शामिल होगा और इसे रोटेशन के आधार पर लागू किया जाएगा।
सरकार 2002 के पुराने परिसीमन कानून को समाप्त कर ‘द डीलिमिटेशन बिल, 2026’ (The Delimitation Bill, 2026) ला रही है। इसके तहत एक उच्चाधिकार प्राप्त परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा।
परिसीमन आयोग की संरचना:
विधेयक में स्पष्ट किया गया है कि परिसीमन आयोग के आदेश राजपत्र (Gazette) में प्रकाशित होने के बाद कानून का दर्जा प्राप्त कर लेंगे और इन्हें देश की किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। हालांकि, यह स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान लोकसभा या विधानसभाओं का कार्यकाल खत्म होने तक मौजूदा व्यवस्था ही लागू रहेगी। इस बीच होने वाले कोई भी उपचुनाव पुराने परिसीमन के आधार पर ही कराए जाएंगे।
निष्कर्ष: यह प्रस्तावित विधेयक भारतीय राजनीति की दिशा और दशा बदलने वाला साबित होगा। बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में जनप्रतिनिधियों की संख्या बढ़ने से जनता को बेहतर प्रतिनिधित्व मिलेगा, साथ ही महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने में यह एक मील का पत्थर साबित होगा। अब सभी की निगाहें 16 अप्रैल से शुरू हो रहे संसद के विशेष सत्र पर टिकी हैं।
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