राज्य शासन की अनुमति के बिना स्थानांतरण को बताया अवैध, आदेश निरस्त
बिलासपुर | छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक अधिकारों की सीमा तय करते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कलेक्टर के पास बिना राज्य शासन की पूर्व अनुमति या अनुमोदन के जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) का प्रभार बदलने का अधिकार नहीं है। जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू की एकल पीठ ने कलेक्टर जीपीएम (गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही) द्वारा जारी स्थानांतरण आदेश को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता को पुनः CEO के पद पर बहाल करने का निर्देश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
बिलासपुर निवासी श्रीमती शुभा दामोदर मिश्रा को जून 2025 में आदिम जाति विकास विभाग, रायपुर के सचिव द्वारा CEO जनपद पंचायत गौरेला के पद पर नियुक्त किया गया था। वे वहां सुचारू रूप से कार्य कर रही थीं। इसी बीच, 11 मार्च 2026 को कलेक्टर जीपीएम ने एक आदेश जारी कर उन्हें CEO के पद से हटाते हुए सहायक आयुक्त आदिवासी विकास कार्यालय में संबद्ध कर दिया था।
कलेक्टर के आदेश को कोर्ट में चुनौती
कलेक्टर के इस फैसले के खिलाफ श्रीमती शुभा मिश्रा ने अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय और ऋषभदेव साहू के माध्यम से हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। याचिका में तर्क दिया गया कि:
- याचिकाकर्ता की नियुक्ति राज्य शासन द्वारा की गई थी।
- शासन के 11 अप्रैल 2025 के सर्कुलर के अनुसार, शासन द्वारा नियुक्त CEO को हटाने का अधिकार कलेक्टर को नहीं है।
- नियमों के तहत प्रभार बदलने के लिए राज्य शासन की पूर्व अनुमति अनिवार्य है, जिसका इस मामले में उल्लंघन किया गया।
कोर्ट का फैसला
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के तर्कों को सही पाया। कोर्ट ने माना कि कलेक्टर ने शासन के सर्कुलर और निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया है। कोर्ट ने कलेक्टर जीपीएम के आदेश को खारिज करते हुए श्रीमती शुभा मिश्रा को तत्काल प्रभाव से CEO जनपद पंचायत गौरेला के पद पर यथावत रखने का आदेश दिया।