ताड़मेटला नक्सली हमले पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: आरोपियों की रिहाई बरकरार, जांच पर उठाए गंभीर सवाल…

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ताड़मेटला नक्सली हमले पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: आरोपियों की रिहाई बरकरार, जांच पर उठाए गंभीर सवाल…

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बहुचर्चित ताड़मेटला नक्सली हमले मामले में गुरुवार को अहम फैसला सुनाते हुए निचली अदालत द्वारा आरोपियों को बरी किए जाने के निर्णय को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि मामला बेहद गंभीर और दुखद होने के बावजूद पर्याप्त एवं ठोस साक्ष्यों के अभाव में किसी भी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

यह मामला 6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा जिले (वर्तमान सुकमा) के ताड़मेटला इलाके में हुए उस भीषण नक्सली हमले से जुड़ा है, जिसमें घात लगाकर किए गए हमले में सीआरपीएफ और पुलिस बल के 76 जवान शहीद हो गए थे। इसे देश के नक्सल इतिहास के सबसे बड़े और जघन्य हमलों में गिना जाता है।

इस मामले में राज्य सरकार द्वारा दायर अपील पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल शामिल थे, ने सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुनाया। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस निर्णय को सही माना, जिसमें सबूतों के अभाव में आरोपियों को बरी कर दिया गया था।

जांच प्रक्रिया पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि इतने संवेदनशील और गंभीर मामले में जांच में कई महत्वपूर्ण खामियां रहीं, जिनका सीधा असर अभियोजन पक्ष के मामले पर पड़ा।

कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात को गंभीर माना कि आरोपियों की शिनाख्ती परेड नहीं कराई गई। इसके अलावा अभियोजन पक्ष यह साबित करने में भी असफल रहा कि आरोपियों का नक्सली संगठनों से प्रत्यक्ष संबंध था। अदालत ने यह भी कहा कि आर्म्स एक्ट के तहत जरूरी दस्तावेज और रिकॉर्ड भी प्रस्तुत नहीं किए गए, जिससे मामले की कानूनी मजबूती कमजोर पड़ गई।

भविष्य के लिए सरकार को निर्देश

हाईकोर्ट ने 76 जवानों की शहादत को “अत्यंत दुखद और गंभीर” बताते हुए राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिए हैं कि भविष्य में ऐसे जघन्य मामलों की जांच पूरी गंभीरता, पेशेवर दक्षता और कानूनी मजबूती के साथ की जाए, ताकि तकनीकी और जांच संबंधी कमियों के कारण आरोपियों को रिहाई का अवसर न मिल सके।

अदालत की यह टिप्पणी राज्य की जांच एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश मानी जा रही है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी गंभीर अपराध में दोषसिद्धि केवल भावनाओं या घटनाओं की भयावहता के आधार पर नहीं, बल्कि मजबूत और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही संभव है।

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