
PWD ने बिना अधिग्रहण दुर्ग में सड़क बनाने के लिए किया था ज़मीन का इस्तेमाल; सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की अपील को बताया ‘बेबुनियाद’
नई दिल्ली/दुर्ग सुप्रीम कोर्ट ने बिना किसी वैधानिक अधिग्रहण प्रक्रिया के निजी ज़मीन पर लगभग 25 वर्षों तक कब्ज़ा जमाए रखने के मामले में छत्तीसगढ़ सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकार की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें ज़मीन मालिकों को दिए गए बढ़े हुए मुआवज़े और उस पर लगने वाले ब्याज को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने इसे राज्य की “पूरी तरह से बेबुनियाद” कोशिश करार देते हुए उस पर ₹2 लाख का जुर्माना (कॉस्ट) भी लगाया है।
जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। इस फैसले में राज्य को ज़मीन मालिकों को ₹5,380 प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवज़ा देने का निर्देश दिया गया था। पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य द्वारा इस मामले में दोबारा मुक़दमा लड़ना केवल ज़मीन मालिकों को परेशान करने और उन्हें उनके जायज़ हक़ से वंचित करने की एक अनुचित कोशिश है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि वह 8 हफ़्ते के अंदर जुर्माने की रकम का भुगतान करे।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद दुर्ग ज़िले की एक ज़मीन से जुड़ा है। साल 1986 में लोक निर्माण विभाग (PWD) ने बिना किसी औपचारिक अधिग्रहण के इस ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया और इसका इस्तेमाल सड़क निर्माण के लिए किया। दशकों तक यह मामला दबा रहा, लेकिन 3 मई 2006 को सीमांकन की प्रक्रिया के दौरान इस सरकारी अतिक्रमण का खुलासा हुआ। इसके बाद ज़मीन मालिकों ने अपनी ज़मीन वापस पाने के लिए छत्तीसगढ़ लैंड रेवेन्यू कोड के तहत बेदखली का मुक़दमा शुरू किया। मामला बढ़ता देख राज्य सरकार ने साल 2010 में 1894 के लैंड एक्विजिशन एक्ट की धारा 4 के तहत ज़मीन अधिग्रहण की आधिकारिक प्रक्रिया शुरू की।
मुआवज़े की कानूनी लड़ाई
जून 2011 में जब अंतिम आदेश जारी हुआ, तो सरकार ने 2009-10 की गाइडलाइन दरों के आधार पर ₹4,308 प्रति वर्ग मीटर का मुआवज़ा तय किया। लेकिन जब यह मामला रेफरेंस कोर्ट में गया, तो कोर्ट ने वित्तीय वर्ष 2010-11 की संशोधित गाइडलाइन को लागू करते हुए मुआवज़े को बढ़ाकर ₹5,380 प्रति वर्ग मीटर कर दिया।
इसके साथ ही, कोर्ट ने अधिग्रहण नोटिफिकेशन के प्रकाशन की तारीख से पहले साल के लिए 9% सालाना और उसके बाद पूरा भुगतान होने तक 15% सालाना ब्याज देने का भी निर्देश दिया। हाई कोर्ट ने इस फैसले को बरकरार रखते हुए यह भी साफ किया कि ज़मीन मालिक 2 सितंबर 2006 से ब्याज पाने के हकदार हैं, जब उन्होंने बेदखली का मुकदमा दायर किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दलीलें की खारिज
सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार ने दलील दी थी कि बेदखली का मुकदमा दायर करने की तारीख से ब्याज नहीं गिना जाना चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे नामंजूर कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य ने बिना किसी अधिकार के नागरिकों की ज़मीन पर कब्ज़ा किया और लंबे समय तक उसका इस्तेमाल किया। इतना ही नहीं, 2006 में जब ज़मीन मालिकों ने बेदखली का मुक़दमा दायर किया, तब भी सरकार की ओर से मुआवज़े की कोई पेशकश नहीं की गई। इसलिए, हाई कोर्ट द्वारा मुक़दमा दायर करने की तारीख से मुआवज़े की रक़म पर ब्याज देने का फैसला पूरी तरह से न्यायसंगत और कानूनी रूप से सही है।