
अक्षय तृतीया पर आर्य समाज में यज्ञ और सभा का आयोजन; जलदान सेवा कार्य का हुआ शुभारंभदुर्ग: आर्य समाज में अक्षय तृतीया का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा, उत्साह और आध्यात्मिक गरिमा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर आयोजित विशेष यज्ञ एवं सभा में विद्वानों ने अक्षय तृतीया की महत्ता बताते हुए मानव जीवन में शुभ कर्मों के समावेश पर बल दिया। कार्यक्रम के दौरान भीषण गर्मी को देखते हुए जनसेवा के लिए जलदान सेवा कार्य का भी विधिवत शुभारंभ किया गया।
शुभ कर्मों से ही जीवन में आता है ‘अक्षय’ पुण्य
मुख्य वक्ता पंडित आचार्य अंकित शर्मा शास्त्री ने अपने उद्बोधन में कहा कि अक्षय तृतीया केवल एक तिथि नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति में अक्षय पुण्य और सत्कर्मों के शुभारंभ का प्रतीक है। उन्होंने भगवान परशुराम जयंती, माँ गंगा के अवतरण और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा प्रदान किए गए अक्षय पात्र के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि यह दिन हमें अपने जीवन को शुभ कर्मों से जोड़ने की प्रेरणा देता है।
क्रोध क्षणिक पागलपन, संयम ही स्थायी शक्ति
यज्ञ के पश्चात सभा को संबोधित करते हुए आचार्य डॉ. अजय आर्य ने ‘दुर्वासा नहीं, सुवासा बनो’ का मंत्र दिया। उन्होंने कहा, “दुर्वासा केवल एक नाम नहीं, बल्कि क्रोध और ईर्ष्या से भरी एक मानसिक स्थिति है। इसके विपरीत ‘सुवासा’ वह व्यक्तित्व है जो सुगंध की तरह जहाँ भी जाता है, अपने मधुर व्यवहार और विनम्र वाणी से वातावरण को सुखद बना देता है।”
डॉ. आर्य ने चुटीले अंदाज में समझाया कि जो व्यक्ति हर समय क्रोध में ‘सीटी’ मारता है, लोग उससे प्रेशर कुकर की तरह दूरी बना लेते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि यज्ञ हमें ‘युद्ध’ नहीं बल्कि ‘शुद्ध’ होना सिखाता है। जो स्वयं को जीत लेता है, वही वास्तव में संसार को जीतने का सामर्थ्य रखता है।
इन श्रद्धालुओं ने दिया जलदान सेवा में सहयोग
पर्व के उपलक्ष्य में मानव सेवा का संकल्प लेते हुए जलदान सेवा शुरू की गई। इस पुनीत कार्य में राजकुमार भल्ला, डॉ. आर. के. मल्होत्रा, के. के. शर्मा, धर्मपाल खंडूजा, डोनोडे जी, जी. एस. ठाकुरेल, परमवीर भल्ला, रवि आर्य, शिपी आर्य, सुदर्शन गुप्ता, डॉ. अनुपम मौर्य, हेमा सक्सेना, नीता दास, सरपाल जी एवं अन्य गुप्त दानदाताओं ने अपना विशेष सहयोग प्रदान किया।