
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जांच एजेंसियां “स्वैच्छिक सहयोग (Voluntary Cooperation)” के नाम पर किसी व्यक्ति को अपनी हिरासत में रखकर गिरफ्तारी से जुड़े संवैधानिक सुरक्षा उपायों से बच नहीं सकतीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस के नियंत्रण में आने के बाद किसी नोटिस पर यह लिखवा लेना कि व्यक्ति स्वेच्छा से साथ जा रहा है, वास्तविक सहमति (Genuine Consent) का प्रमाण नहीं माना जा सकता। यह टिप्पणी चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने साइबर फ्रॉड मामले में एक व्यक्ति की गिरफ्तारी और हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि 28 जून 2026 को उसे हरियाणा के रोहतक स्थित घर से उठाकर पहले दिल्ली और फिर छत्तीसगढ़ लाया गया, लेकिन न तो उसे निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया और न ही ट्रांजिट रिमांड लिया गया। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि BNSS की धारा 35(3) के तहत नोटिस दिए जाने के बाद वह स्वेच्छा से पुलिस के साथ गया था और 30 जून 2026 को उसकी औपचारिक गिरफ्तारी की गई।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता 28 जून से 30 जून तक लगातार पुलिस के नियंत्रण में रहा और इस दौरान विभिन्न राज्यों की यात्रा भी पुलिस की निगरानी में कराई गई। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत मिलने वाला संरक्षण उस समय से लागू हो जाता है, जब किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Liberty) पर वास्तविक रूप से अंकुश लग जाता है, न कि केवल तब जब औपचारिक गिरफ्तारी मेमो तैयार किया जाए।
खंडपीठ ने कहा कि यदि जांच एजेंसियों की दलील स्वीकार कर ली जाए तो किसी भी व्यक्ति को “स्वैच्छिक सहयोग” के नाम पर अनिश्चित अवधि तक हिरासत में रखा जा सकता है और बाद में सुविधानुसार गिरफ्तारी दिखाकर संवैधानिक सुरक्षा उपायों को निष्प्रभावी बनाया जा सकता है, जो कानून के शासन के विपरीत होगा।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता की हिरासत संविधान के अनुच्छेद 22 तथा BNSS की धारा 187 का उल्लंघन थी। अदालत ने रिमांड आदेशों को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता की तत्काल रिहाई का निर्देश दिया।