मुकदमेबाजी नहीं, संवाद से सुलझेंगे विवाद: मीडिएशन 3.0 की सफलता के लिए जिला न्यायाधीश ने अधिवक्ताओं से किया संवाद

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मुकदमेबाजी नहीं, संवाद से सुलझेंगे विवाद: मीडिएशन 3.0 की सफलता के लिए जिला न्यायाधीश ने अधिवक्ताओं से किया संवाद

न्याय को तेज, सहज और रिश्तों को बचाने वाली प्रक्रिया बनाने पर जोर | केस से पहले ‘कन्वर्सेशन’ को मिलेगा बढ़ावा

दुर्ग, : हर विवाद का अंत अदालत के फैसले से ही हो, यह जरूरी नहीं। कभी-कभी एक सही संवाद वह काम कर देता है, जो वर्षों लंबी चलने वाली मुकदमेबाजी भी नहीं कर पाती। इसी सकारात्मक सोच के साथ ‘मीडिएशन 3.0’ (मध्यस्थता) को दुर्ग जिले में और अधिक प्रभावी बनाने के लिए मंगलवार को एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।

माननीय प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश एवं अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) श्री के. विनोद कुजूर ने जिला अधिवक्ता संघ के साथ एक अहम बैठक की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य मध्यस्थता को अधिक प्रभावी बनाना और अधिकाधिक उपयुक्त मामलों को अदालत की बजाय बातचीत के माध्यम से समाधान तक पहुंचाना था।

विवादों में ‘हार-जीत’ नहीं, बल्कि समाधान तलाशने पर जोर बैठक के दौरान इस बात पर विशेष रूप से मंथन किया गया कि हर विवाद में केवल यह देखना जरूरी नहीं है कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा। इसके बजाय दोनों पक्षों के लिए एक ऐसा समाधान तलाशा जाना चाहिए, जिसमें किसी की भी अनावश्यक हार न हो।

प्रधान जिला न्यायाधीश श्री कुजूर ने अपने संबोधन में अधिवक्ताओं से आह्वान किया कि वे ऐसे मामलों की पहचान करने में सक्रिय भूमिका निभाएं, जिनमें मध्यस्थता के माध्यम से पक्षकारों के बीच संवाद स्थापित कर स्थायी एवं स्वीकार्य समाधान निकाला जा सके। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अधिवक्ता केवल अपने पक्षकार के कानूनी प्रतिनिधि नहीं होते, बल्कि वे पक्षकार को उपलब्ध सभी वैधानिक और प्रभावी समाधानों के विकल्पों से परिचित कराने वाले मार्गदर्शक भी होते हैं।

मध्यस्थता कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि समाधान की संस्कृति है बैठक में दुर्ग मध्यस्थता केन्द्र के प्रभारी श्री अनिष दुबे ने भी अधिवक्ताओं को संबोधित किया। उन्होंने मध्यस्थता की व्यावहारिक प्रक्रिया और उसके प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़े अहम पहलुओं पर चर्चा की।

श्री दुबे ने कहा, “मध्यस्थता में किसी पक्ष को हराना हमारा लक्ष्य नहीं होता है। यह आपसी सहमति से विवाद को जड़ से खत्म करने का तरीका है।” उन्होंने अधिवक्ताओं से अपील की कि वे अपने प्रकरणों में मध्यस्थता की संभावनाओं को पहचानें और उपयुक्त मामलों में पक्षकारों को इसके लाभों के बारे में विस्तार से समझाएं।

बैठक का मुख्य निष्कर्ष यही रहा कि मध्यस्थता को केवल एक कानूनी औपचारिकता या प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि ‘समाधान की एक नई संस्कृति’ के रूप में विकसित किया जाए, ताकि न्याय तेज, सहज और रिश्तों को बचाने वाला बन सके।

इस महत्वपूर्ण बैठक में जिला अधिवक्ता संघ दुर्ग के अध्यक्ष, सचिव, अन्य पदाधिकारीगण तथा बड़ी संख्या में अधिवक्तागण उपस्थित रहे।

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