
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का बड़ा फैसला, ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को किया रद्द
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अधिनियम की धारा 3(1)(r) के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए अभियोजन पक्ष को पीड़ित का ‘वैध जाति प्रमाणपत्र’ पेश करना अनिवार्य (sine qua non) है। केवल मौखिक दावा या अस्थायी प्रमाणपत्र साक्ष्य के रूप में पर्याप्त नहीं माना जाएगा।
क्या था मामला?
यह मामला लगभग 21 वर्ष पुराना है, जिसमें सरकारी जमीन पर दुकान निर्माण को लेकर हुए विवाद के दौरान आरोपियों पर शिकायतकर्ता को जातिसूचक गालियां देने, मारपीट करने और जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगा था। ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को आईपीसी की धाराओं और एससी/एसटी एक्ट के तहत दोषी करार दिया था, जिसे आरोपियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट की टिप्पणी और निर्णय
जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि:
- अधिनियम के तहत यह साबित करना अभियोजन की जिम्मेदारी है कि पीड़ित अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग से है और आरोपी उस वर्ग का सदस्य नहीं है।
- वर्तमान मामले में शिकायतकर्ता ने केवल तहसीलदार द्वारा जारी ‘अस्थायी’ प्रमाणपत्र पेश किया था, जो सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी स्थायी दस्तावेज नहीं था।
- अदालत ने माना कि बिना ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य (वैध प्रमाणपत्र) के केवल जाति के दावे के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।
सजा में संशोधन
अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) और आपराधिक धमकी (506-2) के तहत दी गई सजा को रद्द कर दिया। हालांकि, गवाहों के बयान के आधार पर आईपीसी की धारा 294 (अश्लील भाषा का प्रयोग) के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया।
चूंकि मामला 21 साल पुराना था और आरोपी एक दिन जेल में रह चुके थे, इसलिए अदालत ने उनकी 6 महीने की जेल की सजा को घटाकर ‘पहले से भुगती गई अवधि’ (Served Period) तक सीमित कर दिया। साथ ही, जुर्माने की राशि को ₹500 से बढ़ाकर ₹2000 प्रति व्यक्ति कर दिया गया है।