
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने प्रदेश के स्त्री रोग विशेषज्ञों और रेडियोलॉजिस्ट को एक बड़ी कानूनी राहत दी है। जस्टिस राजेंद्र कुमार की एकल पीठ ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल किसी गर्भवती नाबालिग की सोनोग्राफी करने भर से डॉक्टर के खिलाफ पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत मामला दर्ज नहीं किया जा सकता। इसी के साथ कोर्ट ने मामले में आरोपी बनाए गए एक डॉक्टर के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) और पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त (Quash) कर दिया है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2023 का है। एक नाबालिग पीड़िता गर्भवती होने के बाद जांच के लिए एक क्लीनिक पहुंची थी, जहां डॉक्टर ने उसका नियमित चिकित्सीय परीक्षण और सोनोग्राफी की। परिजनों को जब नाबालिग के गर्भवती होने का पता चला, तो उन्होंने यौन शोषण की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने मुख्य आरोपी के साथ-साथ सोनोग्राफी करने वाले डॉक्टर को भी पॉक्सो एक्ट की धारा 19 और 21 के तहत आरोपी बना दिया। पुलिस का तर्क था कि डॉक्टर ने पीड़िता के नाबालिग होने की जानकारी पुलिस को नहीं दी।
उम्र का सत्यापन करना डॉक्टर का काम नहीं: हाईकोर्ट
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस राजेंद्र कुमार की बेंच ने पुलिस की इस कार्रवाई को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में तीन मुख्य बातें स्पष्ट कीं:
मूल कार्य जांच करना: सोनोलॉजिस्ट या रेडियोलॉजिस्ट का मुख्य काम मरीज का डॉक्टरी परीक्षण करना और उसकी मेडिकल रिपोर्ट देना है।
उम्र जांचना जिम्मेदारी नहीं: क्लीनिक में आने वाले हर मरीज के दस्तावेजों की फोरेंसिक जांच करना या उसकी उम्र का सत्यापन (Age Verification) करना डॉक्टर की कानूनी जिम्मेदारी नहीं है।
मंशा साबित होना जरूरी: जब तक इस अपराध में डॉक्टर की कोई सीधी भूमिका या जानबूझकर पुलिस से जानकारी छिपाने की मंशा साबित न हो, तब तक उन पर पॉक्सो की धारा 21 नहीं लगाई जा सकती।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाते हुए सख्त लहजे में कहा कि बिना किसी ठोस सबूत के डॉक्टरों को आपराधिक मामलों में घसीटना कानूनी प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि इस तरह की कार्रवाइयों से पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ता है।
हाईकोर्ट के इस फैसले से प्रदेशभर के डॉक्टरों, विशेषकर रेडियोलॉजिस्ट और स्त्री रोग विशेषज्ञों में खुशी की लहर है। कानूनी जानकारों का भी मानना है कि यह फैसला नजीर (Precedent) बनेगा। इससे उन डॉक्टरों को बड़ी सुरक्षा मिलेगी जो कानूनी पचड़े में फंसने के डर से अक्सर आपातकालीन स्थितियों में नाबालिग मरीजों के इलाज या सोनोग्राफी करने से हिचकिचाते थे।