संस्कारों की डोर से जुड़ी प्रगति ही वास्तविक सफलता है : आचार्य डॉ. अजय आर्य

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संस्कारों की डोर से जुड़ी प्रगति ही वास्तविक सफलता है : आचार्य डॉ. अजय आर्य

– भिलाई आर्य समाज में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया गुरु पूर्णिमा का पर्व – वैदिक यज्ञ, मंत्रोच्चार और प्रेरक प्रवचनों से अनुप्राणित हुआ आध्यात्मिक वातावरण

भिलाई। आर्य समाज मंदिर भिलाई में गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और वैदिक परंपराओं के अनुरूप हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। कार्यक्रम में वैदिक यज्ञ, वेदमंत्रों के सस्वर उच्चारण, सत्यार्थ प्रकाश के वाचन और प्रेरक प्रवचनों ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक चेतना से भर दिया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने गुरु परंपरा के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा अर्पित की।

गुरु का मार्गदर्शन हर समस्या का समाधान कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, आर्य समाज के सुप्रसिद्ध वैदिक विद्वान आचार्य डॉ. अजय आर्य ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन का सच्चा पथप्रदर्शक होता है। गुरु ही मनुष्य को बाहरी उपलब्धियों से आगे ले जाकर आत्मबोध, विवेक और सत्य का मार्ग दिखाता है। संसार की अनेक समस्याओं का मूल कारण सही मार्गदर्शन का अभाव है। गुरु का सान्निध्य जीवन को सही दिशा, संतुलन और उद्देश्य प्रदान करता है।

’19 घोड़ों की कथा’ से दिया जीवन का गहरा संदेश अपने उद्बोधन को रोचक बनाते हुए डॉ. आर्य ने 19 घोड़ों के बँटवारे की प्रसिद्ध कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि जब एक पिता के 19 घोड़ों का बँटवारा तीन पुत्रों में नहीं हो पा रहा था, तब एक ज्ञानी गुरु ने अपना एक घोड़ा उसमें मिला दिया। संख्या 20 होते ही बँटवारा आसानी से हो गया और अंत में गुरु ने अपना घोड़ा वापस ले लिया। इस कथा का मर्म समझाते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन भी ऐसी ही उलझनों से घिरा है। गुरु का ज्ञान और अध्यात्म जुड़ते ही कठिन से कठिन परिस्थितियां भी सहज समाधान में बदल जाती हैं।

युवाओं (जेन-ज़ी) के लिए संदेश: ‘संस्कारों से जुड़ी पतंग ही आसमान छूती है’ आचार्य डॉ. अजय आर्य ने विशेष रूप से आज की युवा पीढ़ी (Gen-Z) को संबोधित करते हुए कहा कि आधुनिकता, विज्ञान और नवीन विचारों का स्वागत है, किंतु यह अपनी संस्कृति, परिवार और नैतिक मूल्यों की कीमत पर नहीं होना चाहिए। उन्होंने ‘पतंग’ का बेहद सटीक उदाहरण देते हुए कहा कि आकाश में ऊँचा उड़ना ही सफलता नहीं है, बल्कि डोर से जुड़े रहना आवश्यक है। जिस प्रकार डोर टूटते ही पतंग दिशाहीन होकर गिर जाती है, उसी प्रकार माता-पिता, गुरु, संस्कृति और राष्ट्र से संबंध टूटने पर मनुष्य की सफलता स्थायी नहीं रह सकती।

वैदिक मंत्रों और आत्मचिंतन से सराबोर रहा कार्यक्रम कार्यक्रम के दौरान आचार्य अंकित शास्त्री एवं नंदलाल ने वैदिक मंत्रों का सस्वर उच्चारण कर यज्ञशाला में एक पवित्र वैदिक वातावरण का निर्माण किया। प्रमिला सरपाल ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का भावपूर्ण वाचन किया। वहीं, पड़ाक आर्य ने “मैं कौन हूँ?” विषय पर आत्मा के वास्तविक स्वरूप का विवेचन करते हुए उपस्थित जनों को आत्मचिंतन का गहरा संदेश दिया।

इनकी रही प्रमुख उपस्थिति कार्यक्रम का समापन शांति पाठ एवं सामूहिक प्रार्थना के साथ हुआ। श्रद्धालुओं ने वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार का संकल्प लिया। इस अवसर पर प्रमुख रूप से प्रवीण गुप्ता, अवनी भूषण पुरंग, विनोद कुमार मौर्य, दीपा गुप्ता, सुषमा सोनी, प्रमिला सरपाल, कमलेश आर्य, रवि आर्य, प्रकाश डोनेडे, आचार्य अंकित शास्त्री, धर्मपाल खंडूजा, जवाहरलाल सरपाल, ओमप्रकाश नंदलाल, धीरज शास्त्री, शिपि आर्य, राजेश कुमार सोनी, और अनीता गुप्ता सहित बड़ी संख्या में आर्यजन, मातृशक्ति एवं युवाओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता दर्ज की।

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