गृहिणियों के योगदान को सुप्रीम कोर्ट ने दी नई पहचान, कहा- घर संभालने वाली महिलाएं हैं ‘राष्ट्र निर्माता’

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गृहिणियों के योगदान को सुप्रीम कोर्ट ने दी नई पहचान, कहा- घर संभालने वाली महिलाएं हैं ‘राष्ट्र निर्माता’

नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने गृहिणियों की भूमिका और उनके योगदान को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि घर और परिवार की जिम्मेदारियां निभाने वाली महिलाओं के कार्यों का मूल्यांकन केवल आर्थिक आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि घरेलू महिलाएं समाज और राष्ट्र निर्माण में अहम भूमिका निभाती हैं और उनके श्रम को उचित सम्मान मिलना चाहिए। कोर्ट के अनुसार, एक घरेलू महिला जो परिवार की देखभाल और घर के कामकाज करती है उनकी कीमत कम से कम ₹30 हजार प्रति माह होनी चाहिए।

गृहिणी के योगदान को नहीं किया जा सकता नजरअंदाज

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि, घर की देखभाल, बच्चों का पालन-पोषण, बुजुर्गों की सेवा और परिवार के संचालन में गृहिणियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। उनका कार्य किसी पेशेवर नौकरी से कम नहीं है और इसे केवल इसलिए कम नहीं आंका जा सकता क्योंकि इसके बदले उन्हें वेतन नहीं मिलता। घर संभालने वाली महिलाओं को राष्ट्र निर्माता (नेशन बिल्डर) का दर्जा मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी माना कि, घरेलू कार्यों में लगी महिलाओं के श्रम का आर्थिक मूल्य निर्धारित किया जाना चाहिए और इसे मुआवजा तय करने जैसे मामलों में ध्यान में रखा जाना आवश्यक है।

सड़क दुर्घटना मामले में आया फैसला

यह टिप्पणी हरियाणा में वर्ष 2001 में हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई। दुर्घटना में एक गृहिणी की मौत हो गई थी, जिसके बाद मुआवजे को लेकर मामला अदालत पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए मृतका के पति को करीब 62.77 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि, मुआवजा तय करते समय केवल कमाई करने वाले व्यक्ति के योगदान को ही नहीं, बल्कि परिवार के लिए गृहिणी द्वारा किए गए कार्यों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।

महिलाओं के बिना वेतन वाले कार्यों पर टिप्पणी

अदालत ने अपने निर्णय में उन आंकड़ों का भी उल्लेख किया जिनके अनुसार 15 से 59 वर्ष आयु वर्ग की महिलाएं प्रतिदिन सात घंटे से अधिक समय घरेलू और देखभाल संबंधी कार्यों में बिताती हैं। जबकि पुरुष ऐसे कार्यों में 3 घंटे से भी कम समय देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिलाएं बिना किसी वेतन के परिवार और समाज के लिए जो योगदान देती हैं, वह अमूल्य है। यहां तक कि नौकरी या व्यवसाय करने वाली महिलाएं भी घरेलू जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा निभाती हैं।

मुआवजा तय करने के लिए बनाए गए महत्वपूर्ण मानदंड

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी सड़क दुर्घटना में गृहिणी घायल होती है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तो केवल इस आधार पर मुआवजा कम नहीं किया जा सकता कि उसकी कोई नियमित आय नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि गृहिणी के योगदान का आकलन करते समय उसकी उम्र, शिक्षा, कौशल, पारिवारिक जिम्मेदारियां, सामाजिक भूमिका और परिवार की आर्थिक स्थिति जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

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