जब जन्मदिन बना संवेदना का पर्व: देवांगन परिवार ने वृद्धाश्रम में मनाई बेटे की खुशी, आचार्य डॉ. अजय आर्य ने दिया संस्कारों का संदेश

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जब जन्मदिन बना संवेदना का पर्व: देवांगन परिवार ने वृद्धाश्रम में मनाई बेटे की खुशी, आचार्य डॉ. अजय आर्य ने दिया संस्कारों का संदेश

भिलाई/दुर्ग: आजकल जहाँ बच्चों का जन्मदिन महंगे उपहारों और भव्य पार्टियों तक सीमित रह गया है, वहीं भिलाई के देवांगन परिवार ने समाज के सामने एक अनूठी और प्रेरक मिसाल पेश की है। परिवार ने अपने सुपुत्र ऋत्विक देवांगन का पाँचवाँ जन्मदिन दुर्ग स्थित ‘आस्था वृद्धाश्रम’ में बुजुर्गों के साथ सेवा, स्नेह और आत्मीयता के बीच मनाया।


​इस अवसर पर न केवल वृद्धजनों का सम्मान कर उनका आशीर्वाद लिया गया, बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया गया कि उत्सवों को यदि सेवा और संवेदना से जोड़ दिया जाए, तो वे जीवनभर के संस्कार बन जाते हैं।

“संस्कार उपदेश से नहीं, व्यवहार से जन्म लेते हैं”
​कार्यक्रम में मुख्य रूप से उपस्थित आचार्य डॉ. अजय आर्य ने अपने प्रभावशाली उद्बोधन से सभी का मन मोह लिया। उन्होंने कहा, “संस्कार उपदेशों से नहीं, घर के व्यवहार से जन्म लेते हैं। बच्चे वह नहीं सीखते जो उनसे कहा जाता है, बल्कि वह सीखते हैं जो वे घर में घटित होते देखते हैं।”


​उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जिस घर में बुजुर्गों का सम्मान नहीं होता, वहाँ संस्कारों की जड़ें कमजोर पड़ने लगती हैं। बच्चों को केवल आधुनिक सुविधाएँ देना पर्याप्त नहीं है; उन्हें सेवा और संवेदना का अनुभव देना चाहिए, क्योंकि केक और उपहार क्षणिक खुशी देते हैं, जबकि बुजुर्गों का आशीर्वाद जीवनभर साथ रहता है।

वृद्धाश्रम के आत्मीय वातावरण को देखकर कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों की आँखें नम हो गईं:
​हेमा सक्सेना: वृद्धाश्रम पहुँचकर भावुक हुईं हेमा सक्सेना ने कहा कि वृद्धजनों की आँखों में अपनापन देखकर महसूस होता है कि सेवा ही जीवन को सार्थक बनाने का सच्चा मार्ग है। उन्होंने इस सामाजिक प्रयास के लिए डॉ. अजय आर्य का हृदय से धन्यवाद किया।
​लीजा देवांगन: उन्होंने बताया कि वृद्धाश्रम में यह आयोजन करने की प्रेरणा उन्हें हेमा सक्सेना के सेवा कार्यों और डॉ. अजय आर्य के सामाजिक प्रयासों से मिली। जब बच्चों की खुशी बुजुर्गों की मुस्कान से जुड़ती है, तो आनंद दोगुना हो जाता है।
​उन्होंने देवांगन परिवार की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि वृद्धजनों के साथ समय बिताना मनुष्य को विनम्र बनाता है। समाज में ऐसे आयोजनों की संख्या बढ़नी चाहिए।
​मनोज ठाकरे: उन्होंने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम परिवारों को सेवा-भावना से जोड़ते हैं और बच्चों में बुजुर्गों के प्रति सम्मान का भाव विकसित करते हैं।

हास्य और धैर्य का अद्भुत संगम
​कार्यक्रम के दौरान एक हल्का-फुल्का और ज्ञानवर्धक प्रसंग भी साझा किया गया। किसी बच्चे ने एक दादाजी से पूछा- “दादाजी, आप इतने शांत कैसे रहते हैं?”
दादाजी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया- “बेटा, उम्र ने दो बातें सिखा दी हैं। पहली- हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता। और दूसरी- जवाब देने से पहले अपना चश्मा ढूँढ लेना चाहिए।” इस प्रसंग ने सभी के चेहरों पर मुस्कान ला दी और यह साबित किया कि वृद्धजनों के पास हास्य और धैर्य के साथ जीवन जीने की अद्भुत कला होती है।

केवल आयोजन नहीं, जीवन-मूल्यों का सशक्त पाठ
​देवांगन परिवार (देवेंद्र देवांगन, लीजा देवांगन, द्रोपती देवांगन, पूजा, रितिका और ऋत्विक) का यह कदम केवल एक पारिवारिक उत्सव नहीं था, बल्कि यह बताने का प्रयास था कि सच्ची खुशी दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने में है।


​कार्यक्रम के अंत में सभी ने एक स्वर में यह संकल्प लिया कि वृद्धजनों का सम्मान और सेवा केवल एक दिन का कार्यक्रम न होकर परिवार और समाज की स्थायी संस्कृति बननी चाहिए।

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