
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति को केवल संदेह या निवारक धाराओं के आधार पर गिरफ्तार कर जेल नहीं भेजा जा सकता। अदालत ने ऐसी कार्रवाई को संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन मानते हुए राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को ₹25 हजार मुआवजा देने का आदेश दिया है।
यह मामला रायगढ़ जिले के घरघोड़ा थाना क्षेत्र से जुड़ा है। याचिकाकर्ता अशरफ बेग को पुलिस ने एक शिकायत के सिलसिले में पूछताछ के लिए थाने बुलाया था। आरोप है कि दोनों पक्षों के बीच सुलह नहीं होने पर पुलिस ने उनके खिलाफ निवारक कार्रवाई (इस्तगासा) दर्ज कर धारा 170/126/135(3) के तहत हिरासत में ले लिया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, 25 अक्टूबर 2025 को कार्यपालिक मजिस्ट्रेट ने ₹1 लाख के बेल बॉन्ड पर उनकी रिहाई का स्पष्ट आदेश दिया था। इसके बावजूद बेल बॉन्ड सत्यापन के नाम पर उन्हें जेल भेज दिया गया और 29 अक्टूबर तक हिरासत में रखा गया। इसके बाद अशरफ बेग ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कार्रवाई को चुनौती दी।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने की। ‘अशरफ बेग बनाम छत्तीसगढ़ राज्य’ मामले में सुनवाई के दौरान पीठ ने पुलिस और प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई।
अदालत ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को गरिमा और सम्मान के साथ जीवन जीने का मौलिक अधिकार देता है। किसी व्यक्ति को केवल संदेह के आधार पर और वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना उसकी स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने पुलिस और मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया को असंवैधानिक और कानून के विपरीत माना।
पीठ ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह याचिकाकर्ता को 30 दिनों के भीतर ₹25 हजार की क्षतिपूर्ति राशि का भुगतान करे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को अपनी शक्तियों का मनमाना या दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।