
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विभागीय जांच से जुड़े एक अहम मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई नहीं की जा सकती। यदि वीडियो का स्रोत, उसकी प्रामाणिकता और उसे कानूनी रूप से प्रमाणित करने की प्रक्रिया स्थापित नहीं की गई है, तो ऐसे साक्ष्य के आधार पर दिए गए निष्कर्ष न्यायिक जांच में टिक नहीं सकते।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए एकलपीठ के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें एक जेल प्रहरी को सेवा से हटाने का आदेश निरस्त कर दिया गया था।
प्रकरण में जेल प्रहरी पर आरोप था कि वह मेडिकल जांच के लिए ले जाए जा रहे एक विचाराधीन कैदी के परिजनों के साथ रेस्तरां में घूमता दिखाई दिया तथा कैदी को निर्धारित समय पर जेल वापस नहीं लाया। विभागीय जांच में इन आरोपों का मुख्य आधार सोशल मीडिया पर वायरल हुआ एक वीडियो था।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि विभाग यह साबित नहीं कर सका कि वीडियो किसने बनाया, कब रिकॉर्ड किया गया, उसका मूल स्रोत क्या था और उसकी प्रामाणिकता किस प्रकार स्थापित की गई। इतना ही नहीं, वीडियो रिकॉर्ड करने वाले अथवा उससे जुड़े किसी भी व्यक्ति का बयान जांच के दौरान दर्ज नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में वायरल वीडियो को वैध साक्ष्य मानकर विभागीय कार्रवाई करना कानून सम्मत नहीं है।
कैदी को देर से जेल लाने के आरोप पर भी अदालत ने कर्मचारी के पक्ष में टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि कर्मचारी का यह स्पष्टीकरण कि चिकित्सक ने जांच रिपोर्ट आने तक कैदी को अस्पताल में रखने की सलाह दी थी, विभाग खंडित नहीं कर सका। इसलिए इस आरोप को भी प्रमाणित नहीं माना जा सकता।
खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि न्यायिक समीक्षा के दौरान हाईकोर्ट सामान्यतः साक्ष्यों की पर्याप्तता का पुनर्मूल्यांकन नहीं करता, लेकिन यदि विभागीय निष्कर्ष किसी वैध और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य पर आधारित ही न हों, तो न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने विभागीय एवं अपीलीय प्राधिकारी के आदेशों को अस्थिर और कानूनसम्मत नहीं मानते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी तथा एकलपीठ के निर्णय को यथावत रखा। यह फैसला विभागीय जांच में इलेक्ट्रॉनिक एवं सोशल मीडिया साक्ष्यों की वैधानिक प्रमाणिकता को लेकर महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है।