लिव-इन रिलेशनशिप में सहमति से बने संबंध को केवल शादी से इनकार के आधार पर रेप नहीं माना जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

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लिव-इन रिलेशनशिप में सहमति से बने संबंध को केवल शादी से इनकार के आधार पर रेप नहीं माना जा सकता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और शादी के वादे पर बने शारीरिक संबंधों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि दो वयस्क लंबे समय तक अपनी इच्छा से लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं, तो सामान्यतः उनके बीच बने शारीरिक संबंधों को आपसी सहमति वाला माना जाएगा। केवल बाद में शादी से इनकार कर देने भर से भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत रेप का अपराध स्वतः सिद्ध नहीं हो जाता।


छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक 40 वर्षीय महिला प्रोजेक्ट मैनेजर की अपील पर सुनवाई के दौरान की। महिला ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2019 में रायपुर स्थित IIM में MBA की पढ़ाई के दौरान उसकी आरोपी से मुलाकात हुई थी। आरोपी ने शादी का भरोसा देकर शारीरिक संबंध बनाए और दोनों करीब दो वर्षों तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे। बाद में आरोपी ने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए शादी से इनकार कर दिया। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि नवंबर 2021 में उसके साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए गए, जिसके बाद दिसंबर 2022 में IPC की धारा 376 और 377 के तहत एफआईआर दर्ज कराई गई।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में आरोपी को बरी कर दिया था। महिला ने अपनी जिरह में स्वीकार किया कि वह महिला आयोग के समक्ष 30 लाख रुपये में समझौते के लिए तैयार थी तथा आरोपी ने 15 लाख रुपये का चेक भी दिया था, जिसका बाद में भुगतान रोक दिया गया। वहीं, महिला के भाई ने भी गवाही में दोनों के बीच प्रेम संबंध और परिवारों की सहमति मिलने पर विवाह करने की बात कही थी।


अदालत ने मेडिकल साक्ष्यों का भी उल्लेख किया। जांच करने वाले डॉक्टर ने बताया कि महिला की चिकित्सीय जांच में न तो जबरदस्ती यौन संबंध और न ही अप्राकृतिक यौन संबंध के कोई प्रमाण मिले।


खंडपीठ ने कहा कि दोनों पक्ष लंबे समय तक स्वेच्छा से रिश्ते में रहे और उपलब्ध साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि शारीरिक संबंध केवल शादी के वादे के कारण बनाए गए थे। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि वर्तमान समय में ऐसे मामलों का मूल्यांकन पुराने सामाजिक नजरिए से नहीं, बल्कि रिश्ते की अवधि, दोनों पक्षों के आचरण और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

इन तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आरोपी को बरी करने के फैसले को सही ठहराया और महिला की अपील खारिज कर दी।

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