
गिरफ्तारी के कारणों और दस्तावेजों में हुई थी बड़ी चूक, शिलॉन्ग कोर्ट ने माना संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन
शिलॉन्ग: मेघालय के बहुचर्चित ‘हनीमून मर्डर’ केस में मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी को शिलॉन्ग कोर्ट से जमानत मिल गई है। अदालत ने पुलिस की उस बड़ी तकनीकी और कानूनी लापरवाही को इस जमानत का आधार बनाया है, जिसमें गिरफ्तारी के दौरान आरोपी को इसके कारणों की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई थी। इसके अलावा, पुलिस के अहम दस्तावेजों में ‘हत्या’ की बजाय ‘संपत्ति के बेईमानी से दुरुपयोग’ की धारा दर्ज कर दी गई थी।
शिलॉन्ग की अतिरिक्त उपायुक्त (न्यायिक) दशालिन आर खारबतेंग ने सोनम की चौथी जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए 50,000 रुपये के निजी मुचलके और कुछ अन्य शर्तों के साथ जमानत मंजूर की। गौरतलब है कि सोनम पर मई 2025 में मेघालय में अपने पति (राजा रघुवंशी) की हत्या का आरोप है और वह जून 2025 में यूपी के गाजीपुर से गिरफ्तारी के बाद से 10 महीने से अधिक समय से जेल में बंद थी।
पुलिस की वो गलतियां जो जमानत का आधार बनीं:
दस्तावेजों में गलत धाराएं: एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(1) (हत्या) दर्ज थी, लेकिन पुलिस ने अरेस्ट मेमो, केस डायरी, निरीक्षण मेमो और अन्य सभी दस्तावेजों में गलती से धारा 403(1) (संपत्ति का बेईमानी से दुरुपयोग) लिख दिया।
अधूरी जानकारी: ‘गिरफ्तारी के कारणों की सूचना’ वाले फॉर्म में पुलिस ने कई अहम चेकबॉक्स खाली (बिना टिक किए) छोड़ दिए थे।
संविधान का उल्लंघन: कोर्ट ने माना कि गिरफ्तारी के कारण न बताना भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) का सीधा उल्लंघन है, जिसके तहत गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के आधार जानने का मौलिक अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मिला लाभ
बचाव पक्ष के वकील ने अदालत को बताया कि सोनम बिना किसी गलती के अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रह सकतीं, जबकि मुकदमा पिछले 2 महीने से रुका हुआ है। कोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए ‘विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य’ (2025) मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, यदि अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन होता है तो गिरफ्तारी रद्द की जा सकती है और जमानत दी जा सकती है।
अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि जब 9 जून, 2025 को सोनम को पहली बार गाजीपुर कोर्ट में पेश किया गया था, तब उनके पास कोई वकील मौजूद नहीं था, इसलिए वह उस वक्त यह आपत्ति दर्ज नहीं करा सकीं।
अभियोजन पक्ष की ‘लिपिकीय त्रुटि’ की दलील खारिज
अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उनका तर्क था कि चूंकि आरोप तय हो चुके हैं, इसलिए दस्तावेजों में गलती का मुद्दा उठाना अब बहुत देर हो चुकी है। उन्होंने चेकबॉक्स खाली छोड़ने और गलत धारा लिखने को केवल एक ‘प्रक्रियात्मक अनियमितता’ (Clerical Error) बताया।
हालांकि, अदालत ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। जज ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “ऐसी गलती सभी दस्तावेज़ों में एक साथ नहीं हो सकती। गिरफ्तारी के औचित्य की चेकलिस्ट से लेकर अरेस्ट मेमो और केस डायरी तक, हर जगह गलत धाराओं का जिक्र है। किसी भी दस्तावेज़ में याचिकाकर्ता को यह सूचित नहीं किया गया कि उसे वास्तव में हत्या जैसे गंभीर अपराध के लिए गिरफ्तार किया गया है।”