
रिश्वत मांगने का आरोप साबित नहीं होने पर दो सरकारी कर्मचारियों को किया बरी, केवल रिश्वत की रकम की बरामदगी पर्याप्त नहीं
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 65-बी के तहत आवश्यक सर्टिफिकेट, वॉइस सैंपल और एफएसएल रिपोर्ट के अभाव में रिश्वत मांगने की वॉइस रिकॉर्डिंग को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराए गए दो सरकारी कर्मचारियों को बरी कर दिया।
जस्टिस रजनी दुबे ने स्पेशल जज (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) के 8 सितंबर 2017 के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगने के आरोप को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। ऐसे में दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
क्या था मामला
अभियोजन के अनुसार शिकायतकर्ता की पत्नी का छह माह का वेतन लंबित था। आरोप था कि वेतन जारी कराने के एवज में एक कर्मचारी ने दूसरे कर्मचारी की ओर से 5,000 रुपये रिश्वत की मांग की। एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) के निर्देश पर शिकायतकर्ता ने आरोपियों के साथ हुई बातचीत रिकॉर्ड की। 12 अक्टूबर 2010 को ट्रैप कार्रवाई के दौरान एक आरोपी की जेब से रिश्वत की राशि बरामद की गई थी।
कोर्ट ने किन कमियों की ओर किया इशारा
सुनवाई के दौरान जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि न तो शिकायतकर्ता और न ही आरोपियों के वॉइस सैंपल लिए गए। रिकॉर्डिंग की कोई एफएसएल जांच भी नहीं कराई गई। गवाहों ने भी माना कि रिकॉर्डिंग स्पष्ट नहीं थी और उसमें कई लोगों की आवाजें सुनाई दे रही थीं। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिए आवश्यक धारा 65-बी का प्रमाणपत्र भी अदालत में प्रस्तुत नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि वॉइस रिकॉर्डिंग की पहचान केवल शिकायतकर्ता के बयान के आधार पर की गई, जबकि तकनीकी रूप से उसकी पुष्टि नहीं हुई। साथ ही रिकॉर्डिंग डिवाइस कई दिनों तक शिकायतकर्ता के पास रहने से उसमें छेड़छाड़ की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
केवल रकम की बरामदगी पर्याप्त नहीं
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के मामलों में दोषसिद्धि के लिए रिश्वत मांगने का ठोस और विश्वसनीय प्रमाण आवश्यक है। केवल रिश्वत की राशि की बरामदगी के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता
हाईकोर्ट ने इस संबंध में दिल्ली हाईकोर्ट के रमेश शर्मा बनाम स्टेट मामले सहित पूर्व के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि टेप या वॉइस रिकॉर्डिंग को साक्ष्य मानने के लिए आवाज की स्पष्ट पहचान, रिकॉर्डिंग की प्रामाणिकता, छेड़छाड़ न होने का प्रमाण और कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए वर्ष 2017 का दोषसिद्धि एवं सजा का आदेश निरस्त कर दोनों अपीलकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी कर दिया।