आईआईटी भिलाई में ‘हिमालयी सौंदर्यशास्त्र’ पर विशेष व्याख्यान, मैकगिल विश्वविद्यालय के डॉ. बनर्जी ने मानव-प्रकृति संबंधों पर डाला प्रकाश

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आईआईटी भिलाई में ‘हिमालयी सौंदर्यशास्त्र’ पर विशेष व्याख्यान, मैकगिल विश्वविद्यालय के डॉ. बनर्जी ने मानव-प्रकृति संबंधों पर डाला प्रकाश

लिबरल आर्ट्स विभाग की ‘इंटरसेक्शन व्याख्यान श्रृंखला’ में साहित्य और कला के नजरिए से हिमालय पर हुई विस्तृत चर्चा।

​भिलाई – भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) भिलाई के लिबरल आर्ट्स विभाग द्वारा सोमवार, 7 सितंबर को ‘इंटरसेक्शन व्याख्यान श्रृंखला’ के तहत एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर कनाडा के प्रतिष्ठित मैकगिल विश्वविद्यालय के डॉ. संदीप बनर्जी ने मुख्य वक्ता के रूप में शिरकत की और “माउंटेन ग्लोम, माउंटेन ग्लोरी: एक्सकर्शन्स इनटू हिमालयन एस्थेटिक्स” विषय पर अपना ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिया।

परिसर में आयोजित इस व्याख्यान में डॉ. बनर्जी ने 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत के बीच हिमालय पर केंद्रित ग्रंथों और छवियों का गहन विश्लेषण किया। उन्होंने ‘हिमालयी सौंदर्यशास्त्र’ की श्रेणी पर बात करते हुए इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे पुरानी तस्वीरों, पेंटिंग, यात्रा वृत्तांतों और कविताओं ने हिमालय को केवल एक भौगोलिक क्षेत्र से आगे बढ़ाकर एक जीवंत ‘अनुभवात्मक स्थल’ के रूप में स्थापित किया।
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व्याख्यान के दौरान डॉ. बनर्जी ने हिमालय को प्रस्तुत करने के लिए कलाकारों और लेखकों द्वारा अपनाई गई विभिन्न रणनीतियों पर चर्चा की। उन्होंने यूरोपीय और भारतीय लेखकों एवं कलाकारों के काम में हिमालय के प्रतिनिधित्व में पाई जाने वाली समानताओं और भिन्नताओं को भी रेखांकित किया। इसके माध्यम से मानव-प्रकृति संबंधों की गहरी समझ विकसित करने का प्रयास किया गया।

कार्यक्रम के अंत में उपस्थित शिक्षाविदों, शोधार्थियों और छात्रों के बीच एक जीवंत परिचर्चा भी हुई। इसमें प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध उपभोग, पर्यावरण के प्रति मानवीय दृष्टिकोण और समकालीन पर्यावरणीय चिंताओं जैसे गंभीर मुद्दों पर सवाल-जवाब किए गए और ग्रंथों को पढ़ने के विभिन्न तरीकों पर मंथन किया गया।
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विदित हो कि लिबरल आर्ट्स विभाग द्वारा आयोजित ‘इंटरसेक्शन व्याख्यान श्रृंखला’ एक बहु-विषयक मंच है। यह लिबरल आर्ट्स, इसकी शिक्षाशास्त्र और कार्यप्रणाली पर खुली चर्चा को प्रोत्साहित करता है। इस मंच का मुख्य उद्देश्य समकालीन सामाजिक और शैक्षणिक जीवन में वैचारिक और चिंतनशील भावना को फिर से केंद्रित करना है, जिसमें समय-समय पर मानविकी और सामाजिक विज्ञान के प्रतिष्ठित प्रोफेसरों को आमंत्रित किया जाता है।

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