
बुरहानपुर। सतपुड़ा के घने जंगल आज भी अपने भीतर प्रकृति के अनगिनत रहस्य और प्राचीन धार्मिक धरोहरें समेटे हुए हैं। इन्हीं रहस्यमयी वादियों में देड़तलाई क्षेत्र के अमुल्ला जंगल में आदि गंगा मां ताप्ती नदी के किनारे स्थित चांदगढ़ की प्राकृतिक गर्भगुफा श्रद्धालुओं के लिए आस्था का अनूठा केंद्र बनी हुई है। बाहर से देखने पर गुफा की चट्टानें मानो शेषनाग के फन का आकार लेती नजर आती हैं, वहीं गुफा के ऊपर से गिरता झरना इस प्राकृतिक धाम की सुंदरता को और भी अलौकिक बना देता है।
झरने के बीच से गर्भगुफा में प्रवेश
करीब पांच फीट ऊंचाई वाले झरने और चट्टानों के बीच स्थित इस गुफा तक पहुंचना किसी रोमांचक यात्रा से कम नहीं है। गुफा का प्रवेश मार्ग लगभग दो फीट ऊंचा और चार फीट चौड़ा है। झरने के बीच से होकर श्रद्धालु गुफा में प्रवेश करते हैं, जहां प्राकृतिक पत्थरों की शिलाएं मां वैष्णो देवी की गर्भगुफा जैसी अनुभूति कराती हैं। स्थानीय ग्रामीण इन प्राकृतिक शिलाओं में माता का स्वरूप मानकर पूजा-अर्चना करते हैं। यहां प्रकृति की बनाई चट्टानें, बहते जल की ध्वनि और जंगलों का सन्नाटा मिलकर एक अलग ही आध्यात्मिक वातावरण रचते हैं।
बुजुर्गों की जुबानी जीवित है इतिहास
यह धार्मिक स्थल कितना प्राचीन है, इसका कोई प्रमाणित लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है। हालांकि, स्थानीय लोगों के अनुसार इसकी मान्यता पीढ़ियों से चली आ रही है। मान्यता है कि इस गुफा में मां शेरावाली का वास है। ग्रामीणों के बीच यह भी जनश्रुति प्रचलित है कि वर्षों पहले गुफा के आसपास शेर दिखाई देते थे। इन कथाओं और स्थानीय आस्था ने चांदगढ़ को एक रहस्यमयी धार्मिक पहचान दी है। गुफा में माता की सेवा और साफ-सफाई की व्यवस्था करने वाले ग्राम गोंद्री निवासी दयालु बाबा बताते हैं कि उन्होंने बचपन से ही इस स्थान के बारे में सुना था। पहले यहां तक पहुंचना और गुफा में दर्शन करना मुश्किल था। साफ-सफाई के अभाव में श्रद्धालुओं को परेशानी होती थी। बाबा के अनुसार, पिछले पांच वर्षों से वे चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां रहकर साफ-सफाई तथा माता की सेवा करते आ रहे हैं। नवरात्र में दूर-दराज के ग्रामीण यहां दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
दुर्गम रास्ता, लेकिन आस्था अटूट
श्रद्धालु गणेश जावरकर बताते हैं कि उन्होंने वैष्णो देवी धाम के बारे में सुना है, लेकिन इस प्राकृतिक गर्भगुफा में आकर उन्हें अपने ही क्षेत्र में माता के दिव्य स्वरूप के दर्शन का अनुभव होता है। उनके अनुसार, पहाड़ों के ऊबड़-खाबड़ रास्तों और जंगलों से गुजरकर यहां पहुंचने के बाद मन को जो शांति मिलती है, वह विशेष अनुभूति है। एक ओर घना जंगल और दूसरी ओर मां ताप्ती का प्रवाह इस स्थान को अद्वितीय बनाता है।
देड़तलाई से 25 किलोमीटर का दुर्गम सफर
चांदगढ़ पहुंचने के लिए देड़तलाई से दाहिंदा, परेठा और झोलपुरा तक सड़क मार्ग से जाना पड़ता है। इसके बाद जंगल की ओर पथरीले कच्चे रास्ते और संकरी पगडंडियों से होकर गुफा तक पहुंचना होता है। देड़तलाई से लगभग 25 किलोमीटर की यह यात्रा प्रकृति प्रेमियों और श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र है, लेकिन दुर्गम रास्ते के कारण यहां पहुंचने में सावधानी जरूरी है।
संरक्षण और सुविधाओं की दरकार
चांदगढ़ केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सतपुड़ा की प्राकृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस स्थल की पहचान और महत्ता को देखते हुए सुरक्षित पहुंच मार्ग, साफ-सफाई, दिशा-सूचक बोर्ड तथा प्राकृतिक वातावरण के संरक्षण की जरूरत है। हालांकि, विकास के नाम पर जंगल और गुफा की प्राकृतिक संरचना से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। घने जंगलों की गोद में, मां ताप्ती के किनारे और झरने की जलधारा के बीच स्थित चांदगढ़ की यह गर्भगुफा आज भी क्षेत्र की अनकही विरासत बनी हुई है। यहां पहुंचने के लिए रास्ता भले ही कठिन हो, लेकिन स्थानीय श्रद्धालुओं की आस्था इस दुर्गम धाम को जीवंत बनाए हुए है। सतपुड़ा के इन जंगलों में छिपा यह प्राकृतिक धार्मिक स्थल संरक्षण और पहचान मिलने की प्रतीक्षा कर रहा है।